भारतीय न्यायपालिका में विविधता की आवश्यकता
उच्च न्यायपालिका में विविधता बहुलतावादी समाजों जैसे भारत में वैधता, निष्पक्षता और प्रभावी न्याय के लिए आवश्यक है। यह समाज की जनसांख्यिकी को प्रतिबिंबित करके जनता का विश्वास बढ़ाती है, विभिन्न जीवन अनुभवों से पक्षपात कम करती है, निर्णय लेने की प्रक्रिया को समृद्ध करती है तथा हाशिए पर पड़े समूहों से संबंधित मुद्दों को बेहतर ढंग से संबोधित करती है।
मुख्य तर्क:
वैधता और विश्वास — अल्पसंख्यक/हाशिए वाले समूहों को लगता है कि व्यवस्था उनकी वास्तविकताओं को समझती है और निष्पक्ष है।
बेहतर निर्णय — विविध दृष्टिकोण पूर्वाग्रहों को चुनौती देते हैं और सामाजिक न्याय के मामलों में अधिक संतुलित फैसले सुनिश्चित करते हैं।
पक्षपात में कमी — विभिन्न पृष्ठभूमियाँ प्रमुख कथाओं को संतुलित करती हैं।
भारत में स्थिति (2026 तक के आंकड़े):
1 जनवरी 2021 से 30 जनवरी 2026 तक उच्च न्यायालयों में कुल 593 न्यायाधीश नियुक्त किए गए।
अनुसूचित जाति (SC): 26 (~4.38%)
अनुसूचित जनजाति (ST): 14 (~2.36%)
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 80 (~13.49%)
अल्पसंख्यक: 37 (~6.23%)
महिलाएँ: 96 (इस अवधि में; कुल उच्च न्यायालयों में वर्तमान में ~14–17% या ~110–130 महिलाएँ, कुल स्वीकृत पदों ~800+ में से)
शेष ~80% (लगभग 79.76%) उच्च जाति/सामान्य वर्ग से हैं।
सर्वोच्च न्यायालय: मुख्यतः उच्च जाति के हिंदू पुरुषों का वर्चस्व; SC/ST/OBC/महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम (महिलाएँ अक्सर 1–2, कुल 33–34 न्यायाधीशों में)।
धार्मिक अल्पसंख्यक: उच्च न्यायपालिका में <5–6%।
उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों का प्रतिनिधित्व ~14.27% (कुछ उच्च न्यायालयों में 0 या सिर्फ 1)।
कोई औपचारिक आरक्षण नीति नहीं (अधीनस्थ न्यायालयों के विपरीत), नियुक्तियाँ कॉलेजियम प्रणाली से होती हैं।
यह असंतुलन बड़ी संख्या में लंबित मामलों (>90,000 सर्वोच्च न्यायालय में, कुल करोड़ों) और कम न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात के बीच है।
हाल के विकास:
DMK सांसद पी. विल्सन द्वारा संविधान (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया गया, जिसमें SC, ST, OBC, महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व, तथा क्षेत्रीय सर्वोच्च न्यायालय बेंच (कोलकाता, मुंबई, चेन्नई आदि) का प्रस्ताव है ताकि पहुंच बढ़े, बैकलॉग कम हो और विविधता सुनिश्चित हो।
सरकार कॉलेजियम को विविधता पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित करती है, लेकिन कोई अनिवार्य कोटा नहीं।
विरोधी तर्क और विचार: कुछ लोग कहते हैं कि विविधता पर जोर देने से योग्यता या निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। लेकिन प्रमाण दिखाते हैं कि विविधता योग्यता को कमजोर नहीं करती, बल्कि दृष्टिकोणों को व्यापक बनाकर निष्पक्षता को मजबूत करती है। लक्ष्य योग्यता को दरकिनार करने वाले कोटा नहीं, बल्कि अयोग्य उम्मीदवारों से विविध प्रतिभा को बढ़ावा देना है।
संक्षेप में, पारदर्शी प्रक्रियाओं, व्यापक प्रतिभा खोज और संभावित सुधारों के माध्यम से अधिक विविधता एक समान, विश्वसनीय न्यायपालिका के लिए महत्वपूर्ण है, जो भारत की विविधता में संवैधानिक मूल्यों जैसे समानता को मजबूती से लागू कर सके।
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